Tuesday, August 5, 2025

आखिर कब सुधरेंगे राहुल गांधी!


भारतीय सेना पर विवादित बयान देकर मानहानि का केस झेल रहे राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट ने पाठ पढ़ाया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी सच्चा भारतीय सेना पर इस तरह की टिप्पणी नहीं कर सकता है. दो हजार किमी तक भारतीय जमीन पर चीन के कब्जे को लेकर भी सु्प्रीम कोर्ट ने कई सवाल दागे. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि किस दस्तावेज के आधार पर आप ऐसा कह सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट के सवाल पर राहुल गांधी की ओर से पेश वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि राहुल गांधी ने मीडिया रिपोर्ट के आधार पर मीडिया द्वारा पूछे गए प्रश्नों के जवाब में ये बयान दिया है. 

मानहानि केस से बचने के लिए राहुल गांधी भले ही सुप्रीम कोर्ट में अपने बयान का ठीकरा मीडिया पर फोड़ रहे हैं लेकिन जब बयान दिया था, तब इस मुद्दे पर सवाल नहीं पूछने पर मीडिया पर बहुत तंज कसा था. जिस बयान को लेकर केस चल रहा है, वह बयान राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान 22 अगस्त, 2022 को दिया था. गलवान घाटी में चीनी सेना से हुई हिंसक झड़प जिक्र करते हुए राहुल गांधी ने एक रैली में दावा किया था कि 'लोग भारत जोड़ो यात्रा के बारे में क्‍या-क्‍या पूछेंगे, लेकिन चीन ने भारत की 2000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया है. चीनी सैनिकों ने हमारे सैनिकों की पिटाई की. इस पर एक भी सवाल नहीं पूछेंगे?' तब लद्दाख के उपराज्यपाल (LG) रि. ब्रिगेडियर बीडी मिश्रा और फिर लोकसभा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बयान देकर राहुल गांधी के दावे को भ्रामक, निराधार और तथ्यहीन बताया था. 

बयानों को लेकर राहुल गांधी का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत गंदा है. और यह कोई पहली बार नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को लताड़ लगाई है. अंग्रेजों के इतिहास में दर्ज सैनिक विद्रोह 1857 को वीर दामोदर ने पहली बार इसे स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई कहा. उस वीर सावरकर को माफी वीर कहने के मामले में भी राहुल गांधी कोर्ट से जमानत पर हैं. 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव 2019 में नारा दिया कि मैं देश का चौकीदार हूं तो इसी नारे को लेकर राहुल गांधी ने कहा कि देश का चौकीदार चोर है. ये मामला भी निचली अदालत से उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय तक मामला पहुंचा. राहुल गांधी ने इस बयान पर कोर्ट में बिना शर्त माफी लेकर अपनी जान छुड़ाई. तब कोर्ट ने भविष्य में सोच समझकर बोलने की चेतावनी दी थी. 

वर्ष 2019 के एक चुनावी रैली में राहुल गांधी ने बोला कि "आखिर सभी चोरों का उपनाम मोदी क्यों है?" इस मामले में तो राहुल गांधी लोकसभा की सांसदी चली गई थी. 'महात्मा गांधी का हत्यारा आरएसएस है', इस बयान को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के बयान पर एक ऑब्जर्वेशन दिय़ा था कि आप सामूहिक रूप से निंदा नहीं कर सकते, इस बयान पर भी केस राहुल गांधी पर चल रहा है. 'अमित शाह हत्या का आरोपी' जैसे बयानों पर मानहानि का केस राहुल गांधी पर चल रहा है. 

नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद, संसदीय परंपरा के तहत पद की गरिमा बनाए रखने के बजाय राहुल गांधी और भी बचकानी और देश विरोधी बयान देने में लगे हैं. इन्होंने अमेरिका में जाकर कहा कि भारत में सिख समाज को गुरुद्वारों में पगड़ी पहनने की इजाजत नहीं है, उन्हें उनके पंथ के अनुरूप व्यवहार करने से रोका जा रहा है. राहुल गांधी का ये बयान न केवल बेबुनियाद और सच्चाई से कोसों दूर है बल्कि यह देश की अखंडता और एकता के लिए बहुत खतरनाक है. 

राहुल गांधी को क्या लगता है कि ऐसे उटपटांग बयान देने से उनकी छवि बेहतर हो रही है? देश में उनके प्रति एक माहौल बन रहा है? राहुल गांधी को समझना होगा किृ सत्ता पर बैठे लोगों को उनके दायित्वों के प्रति कर्तव्यनिष्ठ रखने के लिए एक मजबूत और परिपक्व विपक्ष का होना जरूरी है. ये बात आखिर राहुल गांधी को कब समझ में आएगी? बयानों के जरिए उड़ता तीर लेने का पर्याय बन रहे हैं राहुल गांधी. राहुल गांधी आखिर कब अपने बयानों से परिपक्व और गंभीर नजर आएंगे? 

Monday, November 15, 2021

हिन्दुत्व के बहाने इस्लामिक कट्टरता को परिभाषित कर गए सलमान खुर्शीद

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने एक किताब लिखी, जिसका नाम है “सनराइज ओवर अयोध्या: नेशनहुड इन आवर टाइम“. इसे सलमान खुर्शीद ने अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश का रेफेरेंस बुक बताया. इसमें उन्होंने हिन्दुत्व की तुलना इस्लामिक आतंकी संगठन आईएसआईएस और बोकोहरम से की है. इस पर विवाद होना तय था और हुआ भी. विवाद से संवाद जन्म होता है, लेकिन अब वो दौर नहीं है जहां विचार से विवाद और फिर विवाद से संवाद हो. अब तो वो दौर है, जहां विचार सीढ़ियों की तरह चुनावी गुणा-गणित के अनुसार बदलते हैं और आपके विचार जैसा भी हो, बवाल ही होना है. और बवाल की आग में सब कूदने को तैयार मिलेंगे, और मीडिया टीआरपी के लिए बवाल को हवा देने का काम करेगा.


इस्लामिक चश्मेसे देखते हैं सलमान खुर्शीद

“सनराइज ओवर अयोध्या: नेशनहुड इन आवर टाइम“ पुस्तक के लेखक सलमान खुर्शीद सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में देश के विदेश मंत्री रह चुके हैं. इतना कुछ होने के बाद भी, एक बात सत्य ये भी है कि लेखक को इस्लाम को मानने वाले हैं. उन्होंने अपने इस्लामिक अनुभव से प्राप्त हुए अनुभूति के चश्मे से ही हिन्दू और हिन्दुत्व को देखा और समझा है. तभी उनके पास उदाहरण भी इस्लामिक संगठन का ही है. 

इस्लामिक संगठन के विरोध का सॉफ्ट तरीका है पेज नंबर 113

मुझे व्यक्तिगत तौर सलमान खुर्शीद के विचार से कोई आपत्ति नहीं है. ये पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी सलमान खुर्शीद का तरीका है इस्लामिक संगठन के विरोध का. बोकोहरम और आईएसआईएस को सीधे तौर पर इस्लाम को मानने वाले सलमान खुर्शीद खराब बताने से घबरा रहे हैं. उन्हें पता है, इस्लामिक सत्ता की चाह रखने वाले का विरोध करने का मतलब क्या होता है, कमलेश तिवारी की तरह उदाहरण की अगली कड़ी न बनें, इसलिए उन्होंने विरोध करने के दूसरा तरीका अपनाया है. सलमान खुर्शीद ने किताब के पेज नंबर 113 का चैप्टर है 'सैफरन स्काई' यानी भगवा आसमान लिखकर हरे चादर का विरोध किया है. इसे देखने के लिए सलमान खुर्शीद के इस्लामिक सुधार वाले चश्मे से देखना चाहिए. इसमें सलमान खुर्शीद लिखते हैं -

“हिंदुत्व साधु-सन्तों के सनातन और प्राचीन हिंदू धर्म को किनारे लगा रहा है, जो कि हर तरीके से ISIS और बोको हरम जैसे जिहादी इस्लामी संगठनों जैसा है”.

दूसरे फ्रेम से पारिभाषित करते हैं राहुल

कांग्रेस नेता राहुल गांधी कहते हैं कि कांग्रेस जोड़ने की राजनीति करती है. यही कहते हुए कांग्रेस कार्यकर्ताओं से संवाद करते हुए हिन्दू और हिन्दुत्व को अलग-अलग परिभाषित करने की कोशिश की. महादेव भक्त मार्कडेय के बाद देश में कोई चीर स्थायी युवा है तो वो राहुल गांधी है. उन्होंने चीर स्थायी युवा अवस्था में विवाद पर संवाद करने की कोशिश की. उन्होंने हिन्दू और हिन्दूत्व को गांधी चश्मे के फ्रेम से देखने की कोशिश की. उन्होंने ये फ्रेम स्वच्छ भारत अभियान के प्रचार पोस्टर से उठाया. हास्य कवि सुरेंद्र दूबे के शब्दों में कहें तो जिस शीशे पर स्वच्छ है, वहां भारत नहीं और जिस पर भारत लिखा है, वहां स्वच्छ नहीं. ठीक वैसे ही चीर स्थायी युवा को एक तरफ हिन्दू दिख रहा है तो दूसरी तरफ हिन्दुत्व. नंगी आंख से देखते समय दोनों आंखें एक साथ देखती है. आंखें इसके लिए जन्म से अभयस्त है, लेकिन फ्रेम वो भी दूसरे के चश्मे का, उसमें दिक्कत आती है. इससे शुरुआत में अलग-अलग ही दिखता है. राहुल गांधी कहते एक साथ देखने के लिए युवा से बुजुर्ग होना पड़ता है, जिसके लिए चिर स्थायी युवा अभी मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं.

‘हिंदुत्व’ शब्द का इतिहास और विवाद

हिंदुत्व पर टीवी-डिबेट पर अभी जंग छिड़ी हुई है. अगले टॉपिक मिलने तक यह जारी रहेगा, लेकिन माना जाता है कि हिन्दुत्व शब्द का पहली बार साल 1892 में बंगाली साहित्यकार चंद्रनाथ बसु ने प्रयोग किया. उन्होंने 'हिंदुत्व' शीर्षक देकर एक किताब लिखी. ये पुस्तक हिंदुओं को जागृत करने के उद्देश्य से लिखी गई थी. किताब के द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हिंदुओं को लामबंद करने की कोशिश की गई थी.

हिंदुत्व नाम से ही वीर सावरकर ने वर्ष 1923 में एक पुस्तक लिखी थी. उसके बाद हिन्दुत्व शब्द को असल पहचान मिली. माना जाता है कि इसी पुस्तक के विचार ने हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म दिया था. इसमें सावरकर ने हिन्दू हिंदू कौन है, इसकी व्याख्या की थी. सावरकर के विचारों के मुताबिक, जो धर्म हिंदुस्तान के बाहर पैदा हुए, वो गैर हिंदू यानी ईसाई, इस्लाम, पारसी, यहूदी आदि हैं! जो धर्म भारत में पैदा हुए, वे हिंदू यानी वैदिक, पौराणिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, जैन, बौद्ध, सिख, आर्यसमाजी, ब्रह्म समाजी आदि है. सावरकर के इसी विचार से कई लोग तब भी सहमत नहीं थे और आज भी नहीं हैं.

जवाहर लाल नेहरू की आत्मकथा 'मेरी कहानी' में हिंदू धर्म की व्याख्या की. उन्होंने लिखा -

“मैं समझता हूं कि हिंदू जाति में तरह-तरह के और अक्सर परस्पर विरोधी प्रमाण और रिवाज पाए जाते हैं. इस संबंध में यहां तक कहा जाता है कि हिंदू धर्म साधारण अर्थ में मजहब नहीं कह सकते. फिर भी कितनी गजब की दृढ़ता उसमें है. अपने आप को जिंदा रखने की कितनी जबरदस्त ताकत.”

हिंदुत्व पर पीएम मोदी ने एक रैली में कहा था,

'हजारों साल पुरानी ये संस्कृति और परंपरा है. मुनियों की तपस्या से निकला ज्ञान का भंडार है. हिंदुत्व हर युग की हर कसौटी पर खरा उतरा है. हिंदुत्व का ज्ञान हिमाचल से भी ऊंचा, समुद्र से भी गहरा है. ऋषि-मुनियों ने भी कभी दावा नहीं किया कि उनको हिंदू और हिंदुत्व का पूरा ज्ञान है.'

Monday, October 29, 2012

रुला गया हंसाने वाला


राजीव मंडल

जसपाल भट्टी का अचानक यूं चला जाना अवाक कर गया। उनके जीवन की डोर में ‘कट’ उस समय लगा जब वह अपनी नवनिर्मित फिल्म ‘पावर कट’ के प्रमोशन के लिए भटिंडा से जालंधर आ रहे थे। सामाजिक सरोकारों से जुड़कर भ्रष्ट होते सिस्टम पर चोट करते रहना, उनकी फितरत थी। हंसाते-हंसाते वह आम आदमी से जुड़े मुद्दों पर गंभीर बातें कह जाते थे। कई बार तो सहज और साफ भाषा में किए गए उनके व्यंग्य इतने तीखे होते थे कि निशाने पर आए व्यक्ति या विभाग को थप्पड़ लगने का अहसास होता था। डिग्री तो उन्होंने इंजीनियरिंग की ली थी लेकिन महारत कॉमेडी इंजीनियरिंग में थी।

भट्टी ने चंडीगढ़ स्थित पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के तौर पर स्नातक किया था। सिस्टम की कुरूपता पर जिस अनोखे और अपनी स्टाइल में भट्टी चोट करते थे, उसका हर कोई कायल था। उनके व्यंग्य की धार बहुत तेज थी। सामाजिक मसलों को भट्टी साहब जिस स्पष्टता, ईमानदारी और साफगोई के साथ जनता के सामने पेश करते थे, वैसा न तो उनके पहले कोई पेश कर सका और न उनके बाद वैसी शख्सियत इस जहान में दिखती है। यह उनकी नैतिक ताकत ही थी कि उन्होंने कभी कॉमेडी में द्विअर्थी संवादों की इंट्री नहीं होने दी।

वैसे वक्त में भी नहीं जब व्यंग्य और हास्य के कई कार्यक्रम भारी- भरकम रकम खर्च कर टीआरपी की दौड़ में खुद को बनाए रखने के लिए न जाने कितने जतन कर रहे हैं। जनता की बात कहने के लिए उन्होंने हमेशा गुदगुदाने वाले हास्य का सहारा लिया, न कि उपहास का। नब्बे के दशक के आरंभ में जसपाल भट्टी ने ‘नॉनसेंस क्लब वनाकर हास्य व्यंग्य की दुनिया में कदम रखा था।’

उन्होंने पहले पहल चंडीगढ़ की ‘सुखना लेक’ में इकट्ठा गंदगी और पानी की कमी के लिए स्थानीय प्रशासन पर कटाक्ष करके लोगों का ध्यान आकर्षित किया था। इसके बाद उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह हमेशा अच्छे और सच्चे नागरिक की तरह सतर्क रहें। उन्होंने अपने हास्य- व्यंग्य में किसी को भी नहीं बख्शा। वेशक वह अधिकारी, राजनीतिज्ञ अथवा आम नागरिक ही क्यों न हो। वह जनसाधारण के सच्चे प्रतिनिधि थे। काटरूनिस्ट सुधीर तैलंग के मुताबिक, ‘जसपाल भट्टी भारत के पहले क्रांतिकारी कॉमेडियन थे। उनमें गजब का या यूं कहें आश्र्चय कर देने वाला हास्यबोध था।’ स्टैंडअप कॉमेडियन सुनील पाल के मुताबिक, ‘उनके निधन से उनके निकटतम लोगों के साथ ही आज कॉमेडी भी रो रही है।’

आम आदमी की समस्याओं के चितण्रको लेकर भट्टी को हमेशा याद किया जाएगा। उन्होंने वाकई टीवी पर और खासकर, दूरदर्शन के माध्यम से हास्य की विषयवस्तु को नई दिशा देने में अपना योगदान दिया। उनके टीवी कार्यक्रमों ने आम आदमी के मन में गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने अपने शांत और ईमानदार हास्यबोध से हमेशा लोगों को आनंदित किया। जसपाल भट्टी आम आदमी की समस्याओं पर बेहद गंभीरता से विचार करते थे और उन्हें कॉमेडी के अंदाज में समाज के सामने बेहद धारदार तरीके से पेश करते थे। यही वजह है कि उन्हें आम और खास, हर तरह के लोग पसंद करते थे। ज्वलंत मुद्दों पर किए जाने वाले उनके सटायर (व्यंग्य) का हर किसी को इंतजार रहता था। वह भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के बड़े समर्थक थे।

चाहे महंगाई की मार हो या भ्रष्टाचार का तांडव, हर घाव पर उनके व्यंग्य ने जनता के लिए जहां मरहम का काम किया, वहीं नेताओं को सोचने पर मजबू र भी किया। इन सबके अलावा एक और अच्छी बात यह थी कि भट्टी साहब बॉलीवुड में काम करने के बावजूद कभी भी मुंबई के नहीं हुए। कहने का तात्पर्य यह कि बॉलीवुड की चकाचौंध में भी उन्होंने अपनी पहचान बरकरार रखी। साथ ही, वे चंडीगढ़ के लोगों के अलावा यहां के टैगोर थिएटर में छोटे-मोटे काम करने वालों को भी अपने सीरियल में मौका देकर उनका उत्साहवर्धन किया करते थे। भारतीय टेलीविजन के प्रख्यात हास्य-व्यंग्य कलाकारों में जसपाल सिंह भट्टी एक ऐसे जाने-माने चर्चित चेहरा थे, जो आम आदमी की रोजमर्रा की समस्याओं को बेहद सरल और सहज लेकिन गहरे तक असर करने वाले हास्य के साथ उठाते थे। अपनी टीवी श्रृंखला ‘फ्लॉप शो’ और लघु कैप्सूल ‘उल्टा-पुल्टा’ के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। उनके ये दोनों शो 1980 के दशक के आखिर में और 1990 के दशक के शुरू में दूरदर्शन के स्वर्णिम दौर में दर्शकों को गुदगुदाने में सफल रहे थे। बहुत छोटे बजट की श्रृंखला ‘फ्लॉप शो’ तो मध्यम वर्ग के लोगों की समस्याओं को विशिष्टता के साथ उठाने के लिए आज भी याद किया जाता है। चंडीगढ़ में भट्टी ने नुक्कड़ नाटक भी पेश किए जो खासे लोकप्रिय हुए। उन्होंने समाज में फैले भ्रष्टाचार पर हास्य से भरपूर अपने नाटकों के जरिये जम कर निशाना साधा।

टीवी की दुनिया में आने से पहले भट्टी चंडीगढ़ के अखबार ‘द ट्रिब्यून’ में काटरूनिस्ट थे। छोटे परदे पर अपने शो की सफलता के बाद भट्टी ने हिन्दी और पंजाबी फिल्मों में भी काम किया। 1999 में वह फिल्म ‘जानम समझा करो’ में सलमान खान के निजी सचिव बने और इस भूमिका में लोगों ने उन्हें खूब पसंद किया। चंडीगढ़ के समीप मोहाली में उन्होंने अपनाप्रशिक्षण स्कूल स्थापित किया, जिसका नाम ‘जोक फैक्टरी’ रखा। यहीं उनका एनीमेशन स्कूल ‘मैड आर्ट्स’ भी है, जहां उन्होंने 52 कड़ियों वाली हास्य श्रृंखला ‘थैंक यू जीजाजी’ भी तैयार की। इस स्कूल ने बालिका भ्रूण हत्या पर एनीमेशन फिल्म भी बनाई, जिसे वन टेक मीडिया द्वारा आयोजित ‘एडवांटेज इंडिया’ में दूसरा पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके अलावा, मुंबई में हुए ‘आईडीपीए..2008 अवार्डस’ समारोह में इस एनीमेशन फिल्म को ‘सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट’ भी दिया गया।

भट्टी की नवीनतम फिल्म ‘पॉवर कट’ पंजाब में लगातार की जाने वाली बिजली कटौती पर आधारित है। जसपाल भट्टी ‘डिवाइड इंडिया’ के नाम से चंडीगढ़ में फिल्म महोत्सव का आयोजन करना चाहते थे। इस महोत्सव में वे उत्तर भारतीयों को लेकर अपने बयानों से सुर्खियों में बने राज ठाकरे को निमंतण्रदेना चाहते थे।

Friday, October 19, 2012

टिमटिमाती लौ

अनजाने में ही
नगर बस सेवा की बस के
हिचकोले ने
दे गया
जीवनभर का दंश।

झेल पाना
कितना मुश्किल है
मेरे लिए ...
कुछ के लिए
आसान कैसे
छल-प्रपंच।

तुमने तो भूलवश
छुआ था क्षणिकभर
आैर मजबूरी में
मैंने थामा था तुझको
तिस पर भी
लील लिया था स्वयं ही
शर्म के लिहाफ में।

जाने किस मोड़ पर
छूट गया वो दिन
कहां गया वो मंजर
आैर तुम भी ...।

क्यों आज भी
अधरों पर
होता है महसूस
दीप की कंपकपाती लौ-सी।

Sunday, March 25, 2012

अपनों ने दिए जख्म

शराफत है ज़ख्मी और नेकी बदनाम,
आबरू की उडी धज्जियाँ, बदल गया ईमान।

अपनों ने दिए जख्म, उम्मीदों पर फिरा पानी,
बेखुदी ने किया बेबस, गैरों को कैसे दूँ इलज़ाम॥

Friday, February 3, 2012

'देश राग" नाम से देशभक्ति संगीत प्रतियोगिता का आयोजन

'देश राग" नाम से देशभक्ति संगीत प्रतियोगिता का आयोजन
  • रिकॉर्डेड कृति को ऑनलाइन जमा कराने की आखिरी तारिख 28 फरवरी 2012
  • चयनित पांच कलाकारों की कृति को एक एलबम का रूप दिया जाएगा
  • देशराग के विजयी कलाकार का लाइव परफॉर्म भारत-पाकिस्तान सीमा बाघा बोर्डर पर
लोक सेवा संचार परिषद् द्वारा निर्मित आैर दूरदर्शन द्वारा प्रचारित 1988 में बने 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' गीत ने पूरे भारत देश को एक तार में बांध दिया था। देश के हर कोने में इस गीत की गूंज थी क्योंकि इसमें चौदह भारतीय भाषाओं का प्रयोग किया गया था। वह गीत आज भी कभी दूरदर्शन पर प्रसारित होता है तो मन प्रसन्न हो जाता है।
भारत अब एक आजाद मुल्क है आैर इसलिए अब वतनपरस्ती के मायने बदल चुके हैं। आज गुलामी हमारी समस्या नहीं है लेकिन आज भी हम बहुत सी समस्याओं से घिरे हुए हैं, जिससे पार पाने के लिए रोज संघर्षरत हैं। संघर्षरत रहने के लिए जोश आैर उत्साह बनाए रखने में गीत संगीत का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। देश को आज भी बहुत से 'मिले सुर मेरा तुम्हारा", 'वंदे मातरम" सरीखे देशभक्ति गीतों की जरूरत है।
ऐसे ही देशभक्ति गीत आैर संगीत की खोज के लिए रक्षक फाउंडेशन 'देश राग" नाम से देशभक्ति संगीत प्रतियोगिता का आयोजन कर रही है। इस प्रतियोगिता की साहित्य सहयोगी संस्था कविता कोष है।
देश राग प्रतियोगिता के माध्यम से विश्वभर के भारतीय कलाकारों को आमंत्रित कर रहा है कि वे अपने संगीत साधना से देशभक्ति का एक ऐसा गीत रचें जो भारतीय जनमानस को छू जाए आैर उन्हें देश के लिए कुछ कर गुजरने को प्रेरित करें।
इस प्रतियोगिता में आपको पूरा गीत भेजना होगा जिसमें लेखन, संगीत आैर गायन सभी कुछ प्रतियोगी को ही करना है।
यानि देशभक्ति पर आधारित स्वलिखित गीत को खुद की बनाई धुन पर वाद्ययंत्रों के साथ अपनी ही आवाज में गायन करना है। इसमें व्यक्तिगत तौर पर या बैंड (कई कलाकारों के समूह) के तौर पर हिस्सा लिया जा सकता है।
प्रतियोगिता में भाग लेने के इच्छुक व्यक्तिगत गीतकार, गायक या संगीतकार प्रतियोगिता के नौर्म को पूरा करने के लिए कई कलाकारों के समूह यानि बैंड बनाकर भाग ले सकते हैं।
प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन करने आैर अपनी रिकॉर्डेड कृति को ऑनलाइन जमा कराने की आखिरी तारिख 28 फरवरी 2012 है। इसके बाद एक मार्च से 15 मार्च तक के बीच ऑनलाइन जमा कराए गए रिकॉर्डेड कृति पर निर्णायक मंडल विचार करेंगे। निर्णायक मंडल द्वारा चुने गए अंतिम पांच कृति के कलाकारों की घोषणा 15 मार्च को वेबसाइट पर की जाएगी आैर घोषित कलाकारों को इसकी सूचना व्यक्तिगत तौर पर दी जाएगी।
चयनित पांच कलाकारों की कृति को एक एलबम का रूप दिया जाएगा। इसके लिए 16 मार्च से 31 मार्च के बीच रिकॉर्डिंग टाइम स्लॉट निर्धारित किया जाएगा। एलबम तैयार होने के बाद पांच अप्रैल 2012 को अंतिम पांच प्रतिभागियो में देशराग के विजयी कलाकारों की घोषणा की जाएगी। विजयी कलाकार का लाइव परफॉर्म भारत-पाकिस्तान सीमा बाघा बोर्डर पर किया जाएगा। इस परफार्म में जाने माने कलाकार देशराग के विजयी कलाकार के साथ सुर में सुर मिलाएंगे।
अधिक जानकारी के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट देशराग डॉट ओआरजी वेबसाइट को खंगाला जा सकता है।

Sunday, January 15, 2012

संसद



संवैधानिक कर्तव्यों पर
आम आदमी
जिस तरह
गौण है.

संसद भी
नीति निर्देशक तत्व के
सवाल पर
मौन है.

Tuesday, January 10, 2012

पूछ रहा है देश का बचपन




पूछ रहा है देश का बचपन
राह दिखाने वालों से,
दशा देश की ऐसी क्यूं
क्यों हो, तुम मतवाले से?



लोकतंत्र का ह्रदय हमारा


संसद भी रोया है,


वैष्णो देवी की यात्रा पे


अलख राग भी सोया है,


अपनी ही धरती पर राम


पड़े हुए बंजारे से।





अमरनाथ की यात्रा पर


आतंक यूँ गुर्राया है,


अर्थ जगत का संबल


मुंबई भी थर्राया है,


लाल किला का घाव अभी


है हरा दीवारों पे।




संकट मोचन का प्रांगण


खून से होली खेला है,


अक्षरधाम का अक्षर अक्षर


रक्तपात को झेला है,


घायल क्यों है केसरी बाना


आतंक के अंधियारे से।


वोट बैंक की राजनीति में


देश से कुर्सी प्यारा है,


संसद के बहसों में देखो


जूता -चप्पल न्यारा है,


क्या तेरी काली करतूतों से


मां घायल है तलवारों से।




सुनो हमारी माता ने पीड़ा में


हमें पुकारा है


यौवन लेकर साथ चलें


कमर कसें आगे बढ़े


तरूणाई बनकर बचपन


राख हटा अंगारे से


मुक्ति मिलेगी तभी हमें


आतंकी अंधियारे से...।

Sunday, December 11, 2011

एक पेड़ ऐसा जिस पर फले रूपए

हर आदमी, चाहे वो जहाँ भी है और जिस हालत में है, जीवन यापन कर रहा है। हर एक व्यक्ति अपनी स्थितियों और परिस्थितियों को अपने अनुसार बनाना चाहता है। उनके लिए जो कुछ बन पा रहा है, करने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि जितना सोच पाते हैं, उतना नहीं मिल पाता है।एक मंच ऐसा मुझे दिखा है जहाँ से हर आदमी अपने जरुरत और इच्छा के मुताबिक अपने सपनों को हकीकत में बदल सकता है। अपने साथ साथ परिवार में आने वाली पीढ़ियों के लिए भी रुपये का पेड़ छोड़ सकता है। पेड़ तो एक साल में एक बार फल देता है, लेकिन मैं जिस पेड़ कि बात कर रहा हूँ वो साल में के बार नहीं पूरे बावन हफ्ते रुपये का फल दे सकता है।उस फल को पाने के लिए बस एक बार पेड़ का बीज खरीदना पड़ेगा। बीज को खरीदने के बाद बीज को पौधा बनाने तक ध्यान देना पड़ेगा। बीज एक बार पौधा बन जाये, फिर तो फलदार बनने से कोई नहीं रोक सकता है।रूपये के पेड़ का बीज खरीदने के लिए आपको सेक्योर लाइफ नाम के नेटवर्क मार्केटिंग कंपनी के साथ जुडी कंपनियों का कोई एक प्रोडक्ट जो आपके लिए उपयोगी हो, खरीदना होगा। इसके साथ ही बीज आपके हाथ में आ जायेगा। प्रोडक्ट क्या है, इसे देखने के लिए आप वेब http://www.securedlives.com/ सर्च करके देख सकते है।

खरीदारी के लिए संपर्क करें- ९९७१४२३३५८, ९८९९८४८५२७, ९३१२३८१३०५

Friday, August 26, 2011

देश के नागरिकों से एक आग्रह

जनलोकपाल विधेयक को लेकर देश अभी अन्नामय है। अन्ना के समर्थन में देश के कोने-कोने में धरना प्रदर्शन हो रहे हैं। हजारों लोग दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना के साथ अनशन में शरीक भी हैं। लोगों को लगता है कि अन्ना के अनशन से समाज आैर देश का भला होने वाला है। धीरे-धीरे अन्ना की मुहिम के समर्थकों का कारवां बढ़ रहा है।

फिर भी बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो अन्ना के मुहिम में शामिल होना तो चाहते हैं लेकिन कुछ-न-कुछ ऐसी मजबूरी सामने आ जाती है जो उन्हें अन्ना के साथ खड़ा होने नहीं दे रही है या वह अन्ना की मुहिम में अपना योगदान नहीं कर पा रहे हैं। वैसे लोगों की संख्या हजारों, लाखों नहीं करोड़ों में है। इसमें हम आैर आप भी हैं।

हम आैर आप अन्ना की मुहिम का समर्थन 'यथा शक्ति यथा भक्ति" के मुताबिक भी कर सकते हैं, वह भी बिना दिनचर्या को बिगाड़े। न ज्यादा समय का खर्च आैर न ही ज्यादा आर्थिक नुकसान। अन्ना के मुहिम को बल देने के लिए आपका पचास पैसा बहुत बड़ा योगदान दे सकता है।

पचास पैसा हर कोई खर्च कर सकता है, चाहे जैसी भी परिस्थिति हो। आपको सिर्फ डाकघर तक जाना है। आप जहां भी रहते हैं, या जहां भी हैं, उससे जो भी डाकघर पास पड़ता वहां जाएं पोस्टकार्ड खरीदें आैर प्रधानमंत्री को पत्र लिखें।
फिर देर किस बात की है। डाकघर पहंुचिए आैर पत्र लिख डालिए प्रधानमंत्री के नाम ...।

प्रधानमंत्री के नाम लिखे पत्र में क्या लिखना है, यह आपके स्वविवेक पर निर्भर करता है। आप चाहें तो आम नागरिक होने के नाते सरल शब्दों में अन्ना के सशक्त जनलोकपाल बिल के समर्थन में पत्र लिख सकते हैं या फिर आप आस-पास गैर कानूनी तरीके से होने वाले कार्य निष्पादन के बारे में भी पत्र में लिख सकते हैं।

प्रधानमंत्री के नाम पोस्टकार्ड लिखिए, अन्ना की मुहिम को बल देने के लिए। आपका यह छोटा सा अंशदान आैर श्रमदान देश के भविष्य, सुरक्षा, संरक्षा आैर सवद्र्धन के लिए बहुत जरूरी है। इससे आपकी दिनचर्या पर बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन आपको एक सुखद अहसास जरूर होगा कि आपने भी अन्ना की मुहिम को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। वह भले ही श्रीराम सेतु निर्माण में तल्लीन गिलहरी के योगदान जैसा क्यों न हो।

देश के प्रधानमंत्री का पता है-

प्रधानमंत्री कार्यालय
साउथ ब्लॉक, रायसिना हिल
नई दिल्ली-110001



निवेदक- दीपक राजा
अन्ना मुहिम का समर्थक

Wednesday, August 3, 2011

आवाज़ बुलंद कर हजारे


मगरूर नहीं हैं हम, अपनी ताकत से.
मार डाले नहीं मुझे, अपनी शरारत से..

ताउम्र बीत गई, चक्कर काटते-काटते.
न्याय मिलेगा जरूर, अपनी अदालत से..

मुव्वकिल की जर, जमीन और बिकी जोरू भी.
वकीलों ने बनाई इमारतें, अपनी वकालत से..

उकता गए हैं हम, हे भ्रष्ट प्रहरियों.
सब्र की सीमा है, अपनी शराफत से..

रस्ते के पत्थर ही नहीं, हटेंगे पर्वत भी.
आवाज़ बुलंद कर हजारे, अपनी बगावत से..

कौन आया कायनात में, रहने को सदा.
दिखा दो संसार को, अपनी अदावत से..

Thursday, July 14, 2011

वो चेहरा

ऑफिस से आते ही
मुस्कुराती मिलती है
मेरी जिन्दगी,
जिसे छोड़ जाता हूँ
रोज जाते वक़्त
मुस्कुराता हुआ.

गुलामी आठ घंटे की,
चंद रकम के लिए
रोक देता है,
जिन्दगी को चमकना,
चहकना, दमकना,
बहकना, मचलना.

समय आयेगा
एक ऐसा भी,
जिन्दगी
टहलेगी, दौड़ेगी
मेरे संग,
बनकर हमदम
मंद-मंद मदमस्त होकर.

अभी जैसा भी वक़्त
कट जाता है,
देखकर मुस्कुराता चेहरा
वो चेहरा, चेहरा नहीं
आईना है
मेरे वजूद का,
जो मौजूद है
एक एहसास, मेरे होने का.

Wednesday, April 6, 2011

आवाज़ बुलंद कर 'हजारे', अपनी बगावत से

मगरूर नहीं हैं हम, अपनी ताकत से।
मार डाले नहीं मुझे, अपनी शरारत से॥

ताउम्र बीत गई, चक्कर काटते-काटते।
न्याय मिलेगा जरूर, अपनी अदालत से॥

मुवव्कील की ज़मीन, जर और बिकी जोरू भी।
वकीलों ने बनाई इमारतें, अपनी अदालत से॥

उकता गए हैं हम, हे भ्रष्ट प्रहरियों।
सब्र की सीमा है, अपनी शराफत से॥

रास्ते के पत्थर ही नहीं, हटेंगे पर्वत भी।
आवाज़ बुलंद कर 'हजारे', अपनी बगावत से॥

कौन आया है कायनात में, रहने को 'राजा'।
दिखा दो संसार को, अपनी अदावत से॥

Tuesday, March 22, 2011

‘वेलेंटाइन डे’ प्यार या फूहड़ता?




पाश्‍चात्य देशों में क्रिसमस डे के बाद सबसे ज्यादा उत्साह वेलेंटाइन डे यानी १४ फरवरी को देखने को मिलता है । वेलेंटाइन डे से हमारा कोई लेना-देना नहीं और न ही यह हमारी संस्कृति है, फिर भी पाश्‍चात्य देशों में मनाया जाने वाला वेलेंटाइन डे भारतीय उपमहाद्वीय में भी लोकप्रिय होने लगा है । जैसे-जैसे इसका प्रचार हुआ है, इसकी मुखालफत में स्वर भी मुखर हुए ।

वेलेंटाइन डे मनाने के तरीके को लेकर ही हमारे देश में विरोध होना शुरू हुआ । वेलेंटाइन दे मनाने के नाम पर जो अश्लीलता और भौड़ा प्रदर्शन होता है वह हमारी संस्कृति नही है । इस तरह की प्रवृत्ति हमारी सभ्यता के खिलाफ है । हिंदुस्तानी होने की पहचान ही हमारी सभ्यता है । हिन्दुस्तानी स्कृति में वसुधैव कुटुंबकम सर्वोपरि है । ‘प्यार बांटते चलो’ की राह हमने दुनिया को दिखाई है । मगर प्यार के नाम पर भौंड़ा प्रदर्शन हमने कभी नहीं किया । हमें प्रेम दिवस मनाने में ऐतराज नहीं है । ऐतराज उसके तरीके से है । मौलवी हो या संत, फकीर हो या फादर हम हिन्दुस्तानी हर किसी का आदर करना जानते हैं ।

हमारी संस्कृति हमें ‘स्वयं को तिल-तिल जलाकर सलभ और सुलभ बनना सिखाती है । ‘समर्पण की शिक्षा देती है । प्यार में भी समर्पण है और हमारा जीवन इसी प्यार पर टिका है । हालांकि जिस प्यार पर जीवन आधारित है, वह वेलेंटाइन डे का एक दिवसीय प्यार नहीं हो सकता । प्यार, इश्क और मोहब्बत किसी के लिए खुदा है तो किसी के लिए दिल का सुकून, किसी के लिए जिन्दगी है तो किसी के लिए जीने का सहारा । तभी तो कहा गया ‘दिल की लगी क्या जाने, ऊंच-नीच और रीति-रिवाज, घर बिरादरी और लोक लाज ।’ वेलेंटाइन डे के नाम पर जो प्यार युवाओं में उमड़-उमड़कर पार्कों, सड़कों, सिनेमा हॉलों और मॉल में दिखाई देता है, उसका विरोध लाजिमी है । वेलेंटाइन डे में प्यार नहीं वासना ज्यादा होती है । उसमें दिखावा होता है और जहां दिखावा है वहां स्वाभाविक प्यार हो ही नहीं सकता । ऐसे प्यार में स्वार्थ की दुर्गध आती है इसलिए भारत इसका विरोध करता है । दर‍असल वेलेंटाइन डे सोच उपभोक्‍तावादी संस्कृति का परिणाम है । यह पांच ‘म’ पर आधारित है । ये पांच ‘म’ हैं- मद्य, मीन, मुद्रा और मैथुन ।

अभी हाल में सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक ने एक सर्वे कराया । सर्वे के आधार पर ब्रिटिश पत्रकार डेविड कांडेलेस ने एक रिपोर्ट तैयार की । रिपोर्ट में यह बात उभर कर सामने आई कि वेलेंटैअन डे के बाद सबसे ज्यादा रिश्तों में बिखराव आया, ब्रेक‍अप हुए । यह कैसा प्रेमोत्सव है जो रिश्तों में बिखराव लाता है । इसे हम क्यूं मनाएं । वैसे भी हमारी संस्कृति में प्यार के त्योहारों की कोई कमी नहीं है । संत वेलेंटाइन ने तो परिवार के सदस्यों के आपसी रिश्ते की मजबूती और विवाह जैसी संस्था के लिए संदेश दिया था । आजकल इसके नाम पर भौड़ा प्रदर्शन हो रहा है । इससे हमारी भारतीय छवि प्रभावित हो रही है । इससे समाज में विकृति भी फैलने लगी है । जिस त्योहार से समाज को कोई सीख न मिले, उलटा उससे समाज पर प्रतिकूल असर पड़े उसक तो न मनाना ही हितकर है । हो सकता है कि नई पीढ़ी के तथाकथित आधुनिक युवाओं को इस बात में बुजुरा खयालात नजर आएं, मगर यह एक सच्चाई है जिसे देर सवेर वह भी मानेंगे लेकिन तब तक देर हो चुकी होगी ।

युवाओं में 14 फरवरी को वेलेंटाइन डे के दिन प्यार उमड़-उमड़ कर आ रहा होता है । यह बाजारवाद का प्रभाव है । इसमें समर्पण का वह भाव नहीं दिखता जो रिश्तों को स्थायित्व प्रदान करे । हमारी परम्परा में प्यार 24 घंटे, सातो दिन और जीवनभर ही नहीं जीवन पर्यन्त शामिल है । वेलेंटाइन डे की संस्कृति को बलपूर्वक बढ़ावा बाजार दे रहा है । बाजार को मालूम है कि भारतीय उपमहाद्वीप में युवाओं की संख्या ज्यादा है और अगले पांच दशक तक यह संख्या बनी रहेगी । इसलिए बाजार उन्हें फुसलाने का काम कर रहा है । हमारे जीवन का आधार हमारा प्यार है जिसे हम अनमोल मानते हैं । बाजार उसे वेलेंटाइन डे के माध्यम से बिकाऊ बनाता है ।

बाजार हर चीज को भुनाता है । वेलेंटाइन डे के नाम पर प्यार को भुनाने की कोशिश की जाती है । यूएस ग्रीटिंग कार्ड के आंकलन के मुताबिक पूरे विश्‍व में एक बिलियन कार्डों की बिक्री अकेले वेलेंटाइन डे के समय होती है । उपहार, फूलों का बाजार इतना बढ़ा है कि उसका आंकलन कर पाना मुश्किल है । केवल अपने देश में फूलों व उपहारों का व्यापार १५ करोड़ से ज्यादा है । आप भले ही प्यार करने की कला और शब्द जाल का प्रयोग करना न जानते हों, आप आकर्षक न भी हों फिर भी समर्पण वह कला है जो इन तमाम झंझावतों से इतर वेलेंटाइन डे पर भारी पड़ती है । अगर आप किसी के प्रति समर्पित हैं तो एक न एक दिन उसका प्यार आपको मिलेगा । साल के 365 दिन हमारे लिए प्यार के ही दिन है, फिर वेलेंटाइन डे मनाने कि क्या जरूरत ।

Tuesday, March 8, 2011

... गर औरत चाह ले


... गर औरत चाह ले


फरिश्ता बना ले इसकी हिम्मत, गर औरत चाह ले।
बन जाये कुछ भी वो, गर औरत चाह ले।।

इन्सान का रूतबा खुदा से मिला दे।
इतना उठा दे इन्सान को, गर औरत चाह ले।।

दुनिया कोई ताकत नहीं, जो इसको रोक ले।
नौकर बना ले इन्सान को, गर औरत चाह ले।।

घुट घुट कर जीने की आदत है जिन्हें।
खाक कर दे दुनिया को, गर औरत चाह ले।।

किसको पाने के लिए जीयेगी दुनिया 'राजा'।
छोड़ दे जीना औरत, गर औरत चाह ले।।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर
कविता महिलाओं को समर्पित

Monday, January 31, 2011

मेरा संकल्प


हर बार की तरह
इस बार भी
मेरा संकल्प,
टूट गया दृढ़ होकर
कि तुम्हें देखकर
अनजान बना रह जाऊंगा।
तुम्हारे तमाम कोशिशों को
नाकाम कर जाऊंगा
लेकिन
जैसे ही तुझसे
होता है मेरा सामना,
मेरा संकल्प
कुछ देर के लिए
थम जाता है।

तमाम उलझनों को
भूल जाता हूँ
तुम्हें मंजिल तक पहुँचाने को,
वैसे ही जैसे
उरू (जांघ) अंगद का
राजदरबार में
जम जाता है।

Sunday, January 17, 2010

मेरी सखी डोट इन के लिए

नए साल में कुछ नया करने का मन किया। दोस्तों ने नया कर डाला। एक नया वेब पत्रिका निकाला। मित्रों ने मेरे जन्मदिन पर इसे निकलना शुरू किया... जानकर अच्छा लगा। मैं कुछ कर पाउँगा इतनी तो भगवन शक्ति तो दे ही देगा। भगवन साथ हैं फिर तो मित्रों के प्यार के लिए कुछ वी करूँगा।

Monday, November 9, 2009

माटी की तकदीर।

जीवन में आया नहीं, गांधी की तकरीर

दिल में बस पाया नहीं, वीरों की तसवीर

दीवारों पर ही टंगा रहे, शहीदों की तसवीर

बदलेगी फिर कैसे, देश की तकदीर।

नयनों में पानी भरा है, लपटे नहीं हैंआग की

सर पे चढ़ा सलीब है, भय है कोई दाग की

करते हैं घृणा पापी से, खाते हैं रोटी पाप की

बदल नहीं सकता समय, फिर जीवन का पीर।

पीर बदले या ना बदले, समय बदलता जाता है

ये सच्चाई आदमी नहीं, इतिहास बतलाता है

दूसरों की क्या बात करें, आदमी स्वयं सताता है

हो व्यभिचार कब तलक, देखें कब आता है वीर।

करते रहें चुनाव, कीच-कौवों की बार-बार

बनती रहे सरकार, मुखौटा बदल बार-बार

स्थिरता करती है, आजादी को तार-तार

तोड़ो कपाट, आआ॓ समर में, बनो रक्तवीर।

कहने से स्वराज, देखें कौन रोक रहा है

किसमें इतना है दम, जो आगे आ रोक रहा है

सामने आआ॓, छिपकर तकदीर लिखने वाले

दौड़ रहा है सिंह गर्जन से, रोम-रोम बनकर तीर।

दीवारों से उठकर, मन मंदिर में वास करो

गांधी, सुभाष, गौतम, गुप्त, फिर से रास करो

जीवन में फिर मेरे, ए क नया संचार भरो

मस्त कलन्दर बन सिकन्दर, जीतेंगे हर गीर।

बहुत हो चुका, बहुत ढो चुका,

ढोंगियों की तकरीर सुनकर जोगियों की,

बहुत खो चुका स्वातं®य वीर

अब ना रूकेंगे, अब ना झुकेंगे,

आजमाए ंगे हर तीर

देखें फिर रोकेगा कौन, बदलने से तकदीर।

दिल में जब बस जाए गा,

शहीदों की तसवीर तकरीर बदलेगी,

जरूर बदलेगी, माटी की तकदीर।

-दीपक ‘राजा’

Wednesday, October 28, 2009

डर

खंज़र मेरे सीने में

जो घोंपे हैं तुमने,

उसे आज तक

निकाल नहीं पाया

डरता हूँ, दिल में बसे हो

खंजर निकालते वक़्त

तुम्हें कहीं

खरोंच न लग जाये।

Poet- Dipak Raja