Tuesday, March 8, 2011

... गर औरत चाह ले


... गर औरत चाह ले


फरिश्ता बना ले इसकी हिम्मत, गर औरत चाह ले।
बन जाये कुछ भी वो, गर औरत चाह ले।।

इन्सान का रूतबा खुदा से मिला दे।
इतना उठा दे इन्सान को, गर औरत चाह ले।।

दुनिया कोई ताकत नहीं, जो इसको रोक ले।
नौकर बना ले इन्सान को, गर औरत चाह ले।।

घुट घुट कर जीने की आदत है जिन्हें।
खाक कर दे दुनिया को, गर औरत चाह ले।।

किसको पाने के लिए जीयेगी दुनिया 'राजा'।
छोड़ दे जीना औरत, गर औरत चाह ले।।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर
कविता महिलाओं को समर्पित

Monday, January 31, 2011

मेरा संकल्प


हर बार की तरह
इस बार भी
मेरा संकल्प,
टूट गया दृढ़ होकर
कि तुम्हें देखकर
अनजान बना रह जाऊंगा।
तुम्हारे तमाम कोशिशों को
नाकाम कर जाऊंगा
लेकिन
जैसे ही तुझसे
होता है मेरा सामना,
मेरा संकल्प
कुछ देर के लिए
थम जाता है।

तमाम उलझनों को
भूल जाता हूँ
तुम्हें मंजिल तक पहुँचाने को,
वैसे ही जैसे
उरू (जांघ) अंगद का
राजदरबार में
जम जाता है।

Sunday, January 17, 2010

मेरी सखी डोट इन के लिए

नए साल में कुछ नया करने का मन किया। दोस्तों ने नया कर डाला। एक नया वेब पत्रिका निकाला। मित्रों ने मेरे जन्मदिन पर इसे निकलना शुरू किया... जानकर अच्छा लगा। मैं कुछ कर पाउँगा इतनी तो भगवन शक्ति तो दे ही देगा। भगवन साथ हैं फिर तो मित्रों के प्यार के लिए कुछ वी करूँगा।

Monday, November 9, 2009

माटी की तकदीर।

जीवन में आया नहीं, गांधी की तकरीर

दिल में बस पाया नहीं, वीरों की तसवीर

दीवारों पर ही टंगा रहे, शहीदों की तसवीर

बदलेगी फिर कैसे, देश की तकदीर।

नयनों में पानी भरा है, लपटे नहीं हैंआग की

सर पे चढ़ा सलीब है, भय है कोई दाग की

करते हैं घृणा पापी से, खाते हैं रोटी पाप की

बदल नहीं सकता समय, फिर जीवन का पीर।

पीर बदले या ना बदले, समय बदलता जाता है

ये सच्चाई आदमी नहीं, इतिहास बतलाता है

दूसरों की क्या बात करें, आदमी स्वयं सताता है

हो व्यभिचार कब तलक, देखें कब आता है वीर।

करते रहें चुनाव, कीच-कौवों की बार-बार

बनती रहे सरकार, मुखौटा बदल बार-बार

स्थिरता करती है, आजादी को तार-तार

तोड़ो कपाट, आआ॓ समर में, बनो रक्तवीर।

कहने से स्वराज, देखें कौन रोक रहा है

किसमें इतना है दम, जो आगे आ रोक रहा है

सामने आआ॓, छिपकर तकदीर लिखने वाले

दौड़ रहा है सिंह गर्जन से, रोम-रोम बनकर तीर।

दीवारों से उठकर, मन मंदिर में वास करो

गांधी, सुभाष, गौतम, गुप्त, फिर से रास करो

जीवन में फिर मेरे, ए क नया संचार भरो

मस्त कलन्दर बन सिकन्दर, जीतेंगे हर गीर।

बहुत हो चुका, बहुत ढो चुका,

ढोंगियों की तकरीर सुनकर जोगियों की,

बहुत खो चुका स्वातं®य वीर

अब ना रूकेंगे, अब ना झुकेंगे,

आजमाए ंगे हर तीर

देखें फिर रोकेगा कौन, बदलने से तकदीर।

दिल में जब बस जाए गा,

शहीदों की तसवीर तकरीर बदलेगी,

जरूर बदलेगी, माटी की तकदीर।

-दीपक ‘राजा’

Wednesday, October 28, 2009

डर

खंज़र मेरे सीने में

जो घोंपे हैं तुमने,

उसे आज तक

निकाल नहीं पाया

डरता हूँ, दिल में बसे हो

खंजर निकालते वक़्त

तुम्हें कहीं

खरोंच न लग जाये।

Poet- Dipak Raja

Friday, August 7, 2009

एक मोहबत की तस्वीर


लड़ते लड़ते प्यार इसी को तो कहते है। है न... ।

लिखाड़ बनने की कोशिश में hun

इसे देखकर आप क्या कहेंगे, सावन में झूम रहा है अपनी प्रेयसी के साथ। मगर ये तभी रह पायेगा न जब जंगल रहेगा, जंगल रहे इसके लिए क्या अपने जन्मदिन पर एक पेड़ नही लगा सकते ताकि आने वाली पीढी तस्वीर में नही हकीकत में इसे देखे और फोटो सूट करे।