Wednesday, April 6, 2011

आवाज़ बुलंद कर 'हजारे', अपनी बगावत से

मगरूर नहीं हैं हम, अपनी ताकत से।
मार डाले नहीं मुझे, अपनी शरारत से॥

ताउम्र बीत गई, चक्कर काटते-काटते।
न्याय मिलेगा जरूर, अपनी अदालत से॥

मुवव्कील की ज़मीन, जर और बिकी जोरू भी।
वकीलों ने बनाई इमारतें, अपनी अदालत से॥

उकता गए हैं हम, हे भ्रष्ट प्रहरियों।
सब्र की सीमा है, अपनी शराफत से॥

रास्ते के पत्थर ही नहीं, हटेंगे पर्वत भी।
आवाज़ बुलंद कर 'हजारे', अपनी बगावत से॥

कौन आया है कायनात में, रहने को 'राजा'।
दिखा दो संसार को, अपनी अदावत से॥

Tuesday, March 22, 2011

‘वेलेंटाइन डे’ प्यार या फूहड़ता?




पाश्‍चात्य देशों में क्रिसमस डे के बाद सबसे ज्यादा उत्साह वेलेंटाइन डे यानी १४ फरवरी को देखने को मिलता है । वेलेंटाइन डे से हमारा कोई लेना-देना नहीं और न ही यह हमारी संस्कृति है, फिर भी पाश्‍चात्य देशों में मनाया जाने वाला वेलेंटाइन डे भारतीय उपमहाद्वीय में भी लोकप्रिय होने लगा है । जैसे-जैसे इसका प्रचार हुआ है, इसकी मुखालफत में स्वर भी मुखर हुए ।

वेलेंटाइन डे मनाने के तरीके को लेकर ही हमारे देश में विरोध होना शुरू हुआ । वेलेंटाइन दे मनाने के नाम पर जो अश्लीलता और भौड़ा प्रदर्शन होता है वह हमारी संस्कृति नही है । इस तरह की प्रवृत्ति हमारी सभ्यता के खिलाफ है । हिंदुस्तानी होने की पहचान ही हमारी सभ्यता है । हिन्दुस्तानी स्कृति में वसुधैव कुटुंबकम सर्वोपरि है । ‘प्यार बांटते चलो’ की राह हमने दुनिया को दिखाई है । मगर प्यार के नाम पर भौंड़ा प्रदर्शन हमने कभी नहीं किया । हमें प्रेम दिवस मनाने में ऐतराज नहीं है । ऐतराज उसके तरीके से है । मौलवी हो या संत, फकीर हो या फादर हम हिन्दुस्तानी हर किसी का आदर करना जानते हैं ।

हमारी संस्कृति हमें ‘स्वयं को तिल-तिल जलाकर सलभ और सुलभ बनना सिखाती है । ‘समर्पण की शिक्षा देती है । प्यार में भी समर्पण है और हमारा जीवन इसी प्यार पर टिका है । हालांकि जिस प्यार पर जीवन आधारित है, वह वेलेंटाइन डे का एक दिवसीय प्यार नहीं हो सकता । प्यार, इश्क और मोहब्बत किसी के लिए खुदा है तो किसी के लिए दिल का सुकून, किसी के लिए जिन्दगी है तो किसी के लिए जीने का सहारा । तभी तो कहा गया ‘दिल की लगी क्या जाने, ऊंच-नीच और रीति-रिवाज, घर बिरादरी और लोक लाज ।’ वेलेंटाइन डे के नाम पर जो प्यार युवाओं में उमड़-उमड़कर पार्कों, सड़कों, सिनेमा हॉलों और मॉल में दिखाई देता है, उसका विरोध लाजिमी है । वेलेंटाइन डे में प्यार नहीं वासना ज्यादा होती है । उसमें दिखावा होता है और जहां दिखावा है वहां स्वाभाविक प्यार हो ही नहीं सकता । ऐसे प्यार में स्वार्थ की दुर्गध आती है इसलिए भारत इसका विरोध करता है । दर‍असल वेलेंटाइन डे सोच उपभोक्‍तावादी संस्कृति का परिणाम है । यह पांच ‘म’ पर आधारित है । ये पांच ‘म’ हैं- मद्य, मीन, मुद्रा और मैथुन ।

अभी हाल में सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक ने एक सर्वे कराया । सर्वे के आधार पर ब्रिटिश पत्रकार डेविड कांडेलेस ने एक रिपोर्ट तैयार की । रिपोर्ट में यह बात उभर कर सामने आई कि वेलेंटैअन डे के बाद सबसे ज्यादा रिश्तों में बिखराव आया, ब्रेक‍अप हुए । यह कैसा प्रेमोत्सव है जो रिश्तों में बिखराव लाता है । इसे हम क्यूं मनाएं । वैसे भी हमारी संस्कृति में प्यार के त्योहारों की कोई कमी नहीं है । संत वेलेंटाइन ने तो परिवार के सदस्यों के आपसी रिश्ते की मजबूती और विवाह जैसी संस्था के लिए संदेश दिया था । आजकल इसके नाम पर भौड़ा प्रदर्शन हो रहा है । इससे हमारी भारतीय छवि प्रभावित हो रही है । इससे समाज में विकृति भी फैलने लगी है । जिस त्योहार से समाज को कोई सीख न मिले, उलटा उससे समाज पर प्रतिकूल असर पड़े उसक तो न मनाना ही हितकर है । हो सकता है कि नई पीढ़ी के तथाकथित आधुनिक युवाओं को इस बात में बुजुरा खयालात नजर आएं, मगर यह एक सच्चाई है जिसे देर सवेर वह भी मानेंगे लेकिन तब तक देर हो चुकी होगी ।

युवाओं में 14 फरवरी को वेलेंटाइन डे के दिन प्यार उमड़-उमड़ कर आ रहा होता है । यह बाजारवाद का प्रभाव है । इसमें समर्पण का वह भाव नहीं दिखता जो रिश्तों को स्थायित्व प्रदान करे । हमारी परम्परा में प्यार 24 घंटे, सातो दिन और जीवनभर ही नहीं जीवन पर्यन्त शामिल है । वेलेंटाइन डे की संस्कृति को बलपूर्वक बढ़ावा बाजार दे रहा है । बाजार को मालूम है कि भारतीय उपमहाद्वीप में युवाओं की संख्या ज्यादा है और अगले पांच दशक तक यह संख्या बनी रहेगी । इसलिए बाजार उन्हें फुसलाने का काम कर रहा है । हमारे जीवन का आधार हमारा प्यार है जिसे हम अनमोल मानते हैं । बाजार उसे वेलेंटाइन डे के माध्यम से बिकाऊ बनाता है ।

बाजार हर चीज को भुनाता है । वेलेंटाइन डे के नाम पर प्यार को भुनाने की कोशिश की जाती है । यूएस ग्रीटिंग कार्ड के आंकलन के मुताबिक पूरे विश्‍व में एक बिलियन कार्डों की बिक्री अकेले वेलेंटाइन डे के समय होती है । उपहार, फूलों का बाजार इतना बढ़ा है कि उसका आंकलन कर पाना मुश्किल है । केवल अपने देश में फूलों व उपहारों का व्यापार १५ करोड़ से ज्यादा है । आप भले ही प्यार करने की कला और शब्द जाल का प्रयोग करना न जानते हों, आप आकर्षक न भी हों फिर भी समर्पण वह कला है जो इन तमाम झंझावतों से इतर वेलेंटाइन डे पर भारी पड़ती है । अगर आप किसी के प्रति समर्पित हैं तो एक न एक दिन उसका प्यार आपको मिलेगा । साल के 365 दिन हमारे लिए प्यार के ही दिन है, फिर वेलेंटाइन डे मनाने कि क्या जरूरत ।

Tuesday, March 8, 2011

... गर औरत चाह ले


... गर औरत चाह ले


फरिश्ता बना ले इसकी हिम्मत, गर औरत चाह ले।
बन जाये कुछ भी वो, गर औरत चाह ले।।

इन्सान का रूतबा खुदा से मिला दे।
इतना उठा दे इन्सान को, गर औरत चाह ले।।

दुनिया कोई ताकत नहीं, जो इसको रोक ले।
नौकर बना ले इन्सान को, गर औरत चाह ले।।

घुट घुट कर जीने की आदत है जिन्हें।
खाक कर दे दुनिया को, गर औरत चाह ले।।

किसको पाने के लिए जीयेगी दुनिया 'राजा'।
छोड़ दे जीना औरत, गर औरत चाह ले।।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर
कविता महिलाओं को समर्पित

Monday, January 31, 2011

मेरा संकल्प


हर बार की तरह
इस बार भी
मेरा संकल्प,
टूट गया दृढ़ होकर
कि तुम्हें देखकर
अनजान बना रह जाऊंगा।
तुम्हारे तमाम कोशिशों को
नाकाम कर जाऊंगा
लेकिन
जैसे ही तुझसे
होता है मेरा सामना,
मेरा संकल्प
कुछ देर के लिए
थम जाता है।

तमाम उलझनों को
भूल जाता हूँ
तुम्हें मंजिल तक पहुँचाने को,
वैसे ही जैसे
उरू (जांघ) अंगद का
राजदरबार में
जम जाता है।

Sunday, January 17, 2010

मेरी सखी डोट इन के लिए

नए साल में कुछ नया करने का मन किया। दोस्तों ने नया कर डाला। एक नया वेब पत्रिका निकाला। मित्रों ने मेरे जन्मदिन पर इसे निकलना शुरू किया... जानकर अच्छा लगा। मैं कुछ कर पाउँगा इतनी तो भगवन शक्ति तो दे ही देगा। भगवन साथ हैं फिर तो मित्रों के प्यार के लिए कुछ वी करूँगा।

Monday, November 9, 2009

माटी की तकदीर।

जीवन में आया नहीं, गांधी की तकरीर

दिल में बस पाया नहीं, वीरों की तसवीर

दीवारों पर ही टंगा रहे, शहीदों की तसवीर

बदलेगी फिर कैसे, देश की तकदीर।

नयनों में पानी भरा है, लपटे नहीं हैंआग की

सर पे चढ़ा सलीब है, भय है कोई दाग की

करते हैं घृणा पापी से, खाते हैं रोटी पाप की

बदल नहीं सकता समय, फिर जीवन का पीर।

पीर बदले या ना बदले, समय बदलता जाता है

ये सच्चाई आदमी नहीं, इतिहास बतलाता है

दूसरों की क्या बात करें, आदमी स्वयं सताता है

हो व्यभिचार कब तलक, देखें कब आता है वीर।

करते रहें चुनाव, कीच-कौवों की बार-बार

बनती रहे सरकार, मुखौटा बदल बार-बार

स्थिरता करती है, आजादी को तार-तार

तोड़ो कपाट, आआ॓ समर में, बनो रक्तवीर।

कहने से स्वराज, देखें कौन रोक रहा है

किसमें इतना है दम, जो आगे आ रोक रहा है

सामने आआ॓, छिपकर तकदीर लिखने वाले

दौड़ रहा है सिंह गर्जन से, रोम-रोम बनकर तीर।

दीवारों से उठकर, मन मंदिर में वास करो

गांधी, सुभाष, गौतम, गुप्त, फिर से रास करो

जीवन में फिर मेरे, ए क नया संचार भरो

मस्त कलन्दर बन सिकन्दर, जीतेंगे हर गीर।

बहुत हो चुका, बहुत ढो चुका,

ढोंगियों की तकरीर सुनकर जोगियों की,

बहुत खो चुका स्वातं®य वीर

अब ना रूकेंगे, अब ना झुकेंगे,

आजमाए ंगे हर तीर

देखें फिर रोकेगा कौन, बदलने से तकदीर।

दिल में जब बस जाए गा,

शहीदों की तसवीर तकरीर बदलेगी,

जरूर बदलेगी, माटी की तकदीर।

-दीपक ‘राजा’

Wednesday, October 28, 2009

डर

खंज़र मेरे सीने में

जो घोंपे हैं तुमने,

उसे आज तक

निकाल नहीं पाया

डरता हूँ, दिल में बसे हो

खंजर निकालते वक़्त

तुम्हें कहीं

खरोंच न लग जाये।

Poet- Dipak Raja